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नवंबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

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Suicide Poem | By Hariram Regar

 आत्महत्या  क्या विषाद था तेरे मन में? क्यों लटक गया तू फंदे पर? जो औरों को कन्धा देता, क्यों आज है वो पर कंधे पर? क्या गिला रहा इस जीवन से? जो अकाल काल के गले मिला। जिसको नभ में था विचरण करना, क्यों बंद कक्ष-छत तले मिला? क्या इतना विशाल संकट था? जो जीकर ना सुलझा पाया। अरे! इतनी भी क्या शर्म-अकड़? जो अपनो को ना बतलाया।  क्या जीवन से भारी कोई  जीवन में ही आँधी आई? इन छुट-मुट संकट के चक्कर में  मृत्यु ही क्यों मन भायी? हाँ हार गया हो भले मगर, हाँ कुछ ना मिला हो भले मगर, या जीत गया हो भले मगर, पर जीवन थोड़ी था हारा? अरे! हार जीत तो चलती रहती।  इस हार से ही क्यों अँधियारा ?

इश्क़ की अभिलाषा | Ishk Ki Abhilasha | By Hariram Regar

आज  फिर  इश्क़ करने  की अभिलाषा  है।  उनको अपने आग़ोश में लूँगा यह आशा है।  अरसों   बीत  गए   है   उनसे  रूबरू   हुए।  अब बिन पल गँवाये मिल आने की जिज्ञासा है। उनके रूप का दीदार तो हमेशा करता हूँ।  लेकिन हक़ीकत देखने को दिल प्यासा  है।  रोना  धोना  तो  बिछड़न  में  हो  ही जाता है।  लेकिन मिलन का वक़्त है, बड़ा सोणा-सा है।  पता नहीं वो कैसी होगी मुझसे दूर रहकर।  सोचता हूँ ठीक होगी यह दिल को दिलासा है।  अब जल्दी से मिलने की तलब लगी है दिल में।  वक्त भी बहुत हो गया और अब शीतवासा है।  By Hariram Regar