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Suicide Poem | By Hariram Regar

 आत्महत्या  क्या विषाद था तेरे मन में? क्यों लटक गया तू फंदे पर? जो औरों को कन्धा देता, क्यों आज है वो पर कंधे पर? क्या गिला रहा इस जीवन से? जो अकाल काल के गले मिला। जिसको नभ में था विचरण करना, क्यों बंद कक्ष-छत तले मिला? क्या इतना विशाल संकट था? जो जीकर ना सुलझा पाया। अरे! इतनी भी क्या शर्म-अकड़? जो अपनो को ना बतलाया।  क्या जीवन से भारी कोई  जीवन में ही आँधी आई? इन छुट-मुट संकट के चक्कर में  मृत्यु ही क्यों मन भायी? हाँ हार गया हो भले मगर, हाँ कुछ ना मिला हो भले मगर, या जीत गया हो भले मगर, पर जीवन थोड़ी था हारा? अरे! हार जीत तो चलती रहती।  इस हार से ही क्यों अँधियारा ?

हटके से कर

ठान ले अपनी मंजिल क्या है? जान ले अपनी राहें क्या है? कहाँ पे तू भटका है बुद्धू ? पूछ ज़रा दिल चाहे क्या ये? बन मत तू बचकाना, मन को न भटकाना, चुन ले उन राहों को, जिन राहों पे तुझको जाना, किन अँधियारों में भटका है ? तेरे दिल में कुछ तो खटका है।  तू अटका है , तू भटका है। लगता है थोड़ा सटका है।  झटके से उठ, हटके से कर, हिम्मत से काम ले, भटका न कर, मुश्किल से पल्लू  झटका न कर तू अटका न कर, तू लटका न कर  जिंदगी में हार कर  सर पटका न कर रे.......  और सुन.........  जो मुश्किल का तुझे मटका दे।  उसे अपने नीचे लटका दे।  दे कान के निचे तपड़ी, उसको पूरा ही तू सटका दे, हाँ झटका दे, हाँ फटका दे, उसको सूली पर अटका दे।  माहौल गरम हो  तो शांत हो जाओ, जब सर ज़रा चकराए  तो एकांत हो जाओ।  पर मत भूल ! तुने कुछ ठाना है।  मंजिल जरा दूर है।  राहों में चलते जाना है।  कभी फटे में पैर न फ़साना। क्योंकि अपनी राहें है.........   बहुत हार्ड, बहुत हार्ड।  तो.........  झटके से उठ, हटके से कर, हिम्मत से काम ले, भटका