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Suicide Poem | By Hariram Regar

 आत्महत्या  क्या विषाद था तेरे मन में? क्यों लटक गया तू फंदे पर? जो औरों को कन्धा देता, क्यों आज है वो पर कंधे पर? क्या गिला रहा इस जीवन से? जो अकाल काल के गले मिला। जिसको नभ में था विचरण करना, क्यों बंद कक्ष-छत तले मिला? क्या इतना विशाल संकट था? जो जीकर ना सुलझा पाया। अरे! इतनी भी क्या शर्म-अकड़? जो अपनो को ना बतलाया।  क्या जीवन से भारी कोई  जीवन में ही आँधी आई? इन छुट-मुट संकट के चक्कर में  मृत्यु ही क्यों मन भायी? हाँ हार गया हो भले मगर, हाँ कुछ ना मिला हो भले मगर, या जीत गया हो भले मगर, पर जीवन थोड़ी था हारा? अरे! हार जीत तो चलती रहती।  इस हार से ही क्यों अँधियारा ?

अमर जवान

अमर जवान  लाखों ने है लहूँ बहाया , लाखों ने है डंडा खाया , अंग्रेज़ों के उस शासन को जड़ - मूल से काट भगाया सबकी एक अभिलाषा थी “ भारत आज़ाद परिंदा हो ” तुम मरे नहीं हो अमर जवानों , तुम तो दिलों में ज़िंदा हो।। 1 ।। किसी ने गोली खाई थी, तो किसी को फांसी लगायी। कटा दिए थे सिर अपने , भारत की शान बढ़ायी। बड़ी अच्छी थी सोच तुम्हारी, " चाहे हमारी निंदा हो। " तुम मरे नहीं हो अमर जवानों , तुम तो दिलों में ज़िंदा हो।। 2 ।। अपनाई थी स्वदेशी चीजें , विदेशी चीज़ों में आग लगायी। छोड़ दिये सबने दफ्तर सारे , असहयोग की राह अपनायी। साथ दिया था दिल से तुमने , चाहे हिन्दू चाहे मुस्लिम बन्दा हो। तुम मरे नहीं हो अमर जवानों , तुम तो दिलों में ज़िंदा हो।। 3 ।। उरी के हमले से तो अब , हर हिंदुस्तानी का खून खोला था। “ अब नहीं सहन करेंगें इनको ” बच्चा - बच्चा बोला था। ईंट से ईंट बजा देंगे हम, चाहे दुश्मन कितना भी चालाक परिं