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अप्रैल, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

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Suicide Poem | By Hariram Regar

 आत्महत्या  क्या विषाद था तेरे मन में? क्यों लटक गया तू फंदे पर? जो औरों को कन्धा देता, क्यों आज है वो पर कंधे पर? क्या गिला रहा इस जीवन से? जो अकाल काल के गले मिला। जिसको नभ में था विचरण करना, क्यों बंद कक्ष-छत तले मिला? क्या इतना विशाल संकट था? जो जीकर ना सुलझा पाया। अरे! इतनी भी क्या शर्म-अकड़? जो अपनो को ना बतलाया।  क्या जीवन से भारी कोई  जीवन में ही आँधी आई? इन छुट-मुट संकट के चक्कर में  मृत्यु ही क्यों मन भायी? हाँ हार गया हो भले मगर, हाँ कुछ ना मिला हो भले मगर, या जीत गया हो भले मगर, पर जीवन थोड़ी था हारा? अरे! हार जीत तो चलती रहती।  इस हार से ही क्यों अँधियारा ?

हम स्वाभिमान संग जीते है || ham swabhimaan sang jeete hai || By Hariram Regar

  कफ़न बँधे है माथे पर।  चाप-तीर, असि-ढाल रखे है।  हम शेरों से भी भिड़ जाएँ।  शौक गज़ब के पाल रखे है।  अरि आँख उठाकर देखे हम पर  खून हमारी नस नस में खोले।  "हम स्वाभिमान संग जीते है"- इस मिट्टी का कण-कण बोले।  हम आन, बान और शान के ख़ातिर  अपनी जान भी सहज लुटाते है।  हम मर जाएँ, मिट जाएँ लेकिन, इज़्ज़त ना दाव लगाते है।   हम ज़ौहर करना सहज समझते, बजाय हम बैरी के हो लें।  "हम स्वाभिमान संग जीते है"- इस मिट्टी का कण-कण बोले।  अंगुल-बांस के मापन से  यहाँ "पृथ्वी" तीर चलाते है।  बरदाई का दोहा सुनकर  गोरी को मार गिराते है।  बक्षीश मिले ना जयचन्दों को  पग रिपुओं के डगमग डोले।  "हम स्वाभिमान संग जीते है"- इस मिट्टी का कण-कण बोले।  यहाँ राणा का भाला भारी है।  यहाँ मीरा की भक्ति न्यारी है।  माँ पन्ना का त्याग अमोल यहाँ।  यहाँ वीर जणे वो नारी है।  ना नसीब रहे भले घास की रोटी  पर राणा का ना मन डोले।  "हम स्वाभिमान संग जीते है"- इस मिट्टी का कण-कण बोले।  थकी नहीं हैं कलम "हरि" की राजस्थान का गौरव गाते-गाते।  एक से बढ़कर एक शूरमा  यहाँ इतिहास के पन्

Self Respect || By Hariram Regar

स्वाभिमान(Self Respect)  जिस दिन तेरे हाथ में लाठी होगी  जिस दिन तेरी साँझ ढलेगी  वो दिन कितना प्यारा होगा? जिस दिन तू "हरि" से मिलेगी  ये लब्ज़ तेरे है, वचन तेरे है  इन वचन पे आँच न लाऊँगा  मैं खुद को ज़िन्दा रखने वाला  मान नहीं खो पाऊँगा  जो तेरा मेरा यह रिश्ता है  इसका तुझको कोई भान नहीं  मेरे गाँव से तेरा क्या नाता  इसका भी तुझको ध्यान नहीं  और तेरे गाँव में तेरा "सब कुछ" है  ये बात मैं कैसे पचाऊँगा? मैं खुद को ज़िन्दा रखने वाला  मान नहीं खो पाऊँगा  ये इत्तिफ़ाक रहा या मक़सद था  इस ज्ञान का मैं मोहताज़ नहीं  मैं ज़मीं पे चलता मानव हूँ।  तेरे जैसा अकड़बाज़ नहीं  जिस घर में कोई मान न हो  उस घर आँगन न जाऊँगा  मैं खुद को ज़िन्दा रखने वाला  मान नहीं खो पाऊँगा  --- Hariram Regar #SundayPoetry

Ukraine Russia War Poetry || उगते सूरज अस्त हुए || By Hariram Regar

धधक रही संग्राम की ज्वाला। ना दया बची, ना मानवता है। यहाँ कलह, कृन्दन और रूदन है। ये मानव की ही दानवता है। कहीं सिर पड़े, कहीं धड़ पड़े, यहाँ शतकों जीवन पस्त हुए है। हर रोज निकलते सपने लेकर  वो उगते सूरज अस्त हुए है।। यहाँ बच्चे हैं, यहाँ बुढ़े है, यहाँ भरी जवानी लोग घने है। यहाँ बम बारूदों के मंज़र में, लोगों पर ही लोग तने है। कई जली झुग्गी झोपड़ियाँ, कई कई सौ भवन ढहे। ख़ाक हो गए सपने सारे जहाँ घर के घर ही ध्वस्त हुए है। हर रोज निकलते सपने लेकर  वो उगते सूरज अस्त हुए है।। कैसे लिखूँ मैं दर्द पिता का ? जिनके तनय चिता पर चिर सोए। कैसे लिखूँ दर्द उन माँ का मैं? जो अपने प्यारे सुत खोए। कैसे बयाँ करूँ बहनों का दुःख? जिनकी राखी रक्त से रंजित है। कैसे दर्द कहूँ उन बच्चों का जो अपनों से अब वंचित है। कैसे लिखूँ दर्द उस दर्द का मैं जिन घर के सारे दीप बुझे। जहाँ रोने वाला बचा न कोई ये देख 'हरि' के कंपित हस्त हुए है। हर रोज़ निकलते सपने लेकर वो उगते सूरज अस्त हुए है। ---Hariram Regar #SundayPoetry