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Suicide Poem | By Hariram Regar

 आत्महत्या  क्या विषाद था तेरे मन में? क्यों लटक गया तू फंदे पर? जो औरों को कन्धा देता, क्यों आज है वो पर कंधे पर? क्या गिला रहा इस जीवन से? जो अकाल काल के गले मिला। जिसको नभ में था विचरण करना, क्यों बंद कक्ष-छत तले मिला? क्या इतना विशाल संकट था? जो जीकर ना सुलझा पाया। अरे! इतनी भी क्या शर्म-अकड़? जो अपनो को ना बतलाया।  क्या जीवन से भारी कोई  जीवन में ही आँधी आई? इन छुट-मुट संकट के चक्कर में  मृत्यु ही क्यों मन भायी? हाँ हार गया हो भले मगर, हाँ कुछ ना मिला हो भले मगर, या जीत गया हो भले मगर, पर जीवन थोड़ी था हारा? अरे! हार जीत तो चलती रहती।  इस हार से ही क्यों अँधियारा ?

Self Respect || By Hariram Regar


स्वाभिमान(Self Respect) 

जिस दिन तेरे हाथ में लाठी होगी 

जिस दिन तेरी साँझ ढलेगी 

वो दिन कितना प्यारा होगा?

जिस दिन तू "हरि" से मिलेगी 

ये लब्ज़ तेरे है, वचन तेरे है 

इन वचन पे आँच न लाऊँगा 

मैं खुद को ज़िन्दा रखने वाला 

मान नहीं खो पाऊँगा 


जो तेरा मेरा यह रिश्ता है 

इसका तुझको कोई भान नहीं 

मेरे गाँव से तेरा क्या नाता 

इसका भी तुझको ध्यान नहीं 

और तेरे गाँव में तेरा "सब कुछ" है 

ये बात मैं कैसे पचाऊँगा?

मैं खुद को ज़िन्दा रखने वाला 

मान नहीं खो पाऊँगा 


ये इत्तिफ़ाक रहा या मक़सद था 

इस ज्ञान का मैं मोहताज़ नहीं 

मैं ज़मीं पे चलता मानव हूँ। 

तेरे जैसा अकड़बाज़ नहीं 

जिस घर में कोई मान न हो 

उस घर आँगन न जाऊँगा 

मैं खुद को ज़िन्दा रखने वाला 

मान नहीं खो पाऊँगा 

--- Hariram Regar


#SundayPoetry



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चलना मुझे अकेला | Chalna mujhe akela | Motivational Poem | By Hariram Regar

चलना   मुझे    अकेला सड़क   पड़ी     सुनसान   भाइयों ! चलना    मुझे       अकेला    था।  इच्छा   नहीं   थी   मेरी   फिर   भी, मन    ने    मुझे    धकेला     था।  सड़क   पड़ी     सुनसान   भाइयों ! चलना    मुझे       अकेला    था । ।1 । ।   क्या   बारिश   से   रुक   सकता   है ? चन्द्रमा        का        चलना।  क्या   बारिश   से   रुक   सकता   है ? पृथ्वी    का    घूर्णन    करना ।  यह   मेरे   मन   ने   मुझको   बोला   था ।  सड़क   पड़ी     सुनसान   भाइयों ! चलना    मुझे       अकेला    था । ।2 । । आज    बारिश    से    बच    सकता   तू, कल    दुःख    की    बाढ़    में       बहना ।  तू    इतनी   सी   बात    से    डरता    तो, तुझे    स्वलक्ष्य    से    वंचित    रहना ।  मन    ने      मुझे      समझाते       हुए, ऐसा      भी        कह        डाला       था ।  सड़क   पड़ी     सुनसान   भाइयों ! चलना    मुझे       अकेला    था । ।3 । । समय   किसी   से   नहीं   रुकता   है, यह    तो    निरन्तर    चलता   है।  जीत    भी    उसी       की    होती, जो    समय   पर   सम्भलता    है ।  मुझको   भी   ऐसे    ही    चलना, मस्तिष्

तेरा इन्तजार रहेगा | Tera Intzaar Rahega | By Hariram Regar

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जनसंख्या हुई हैं इतनी सारी | By Hariram Regar

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