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Suicide Poem | By Hariram Regar

 आत्महत्या  क्या विषाद था तेरे मन में? क्यों लटक गया तू फंदे पर? जो औरों को कन्धा देता, क्यों आज है वो पर कंधे पर? क्या गिला रहा इस जीवन से? जो अकाल काल के गले मिला। जिसको नभ में था विचरण करना, क्यों बंद कक्ष-छत तले मिला? क्या इतना विशाल संकट था? जो जीकर ना सुलझा पाया। अरे! इतनी भी क्या शर्म-अकड़? जो अपनो को ना बतलाया।  क्या जीवन से भारी कोई  जीवन में ही आँधी आई? इन छुट-मुट संकट के चक्कर में  मृत्यु ही क्यों मन भायी? हाँ हार गया हो भले मगर, हाँ कुछ ना मिला हो भले मगर, या जीत गया हो भले मगर, पर जीवन थोड़ी था हारा? अरे! हार जीत तो चलती रहती।  इस हार से ही क्यों अँधियारा ?

चाँद से गुफ़्तगू

चाँद से गुफ़्तगू  तुम्हारी ये जुल्फें, तुम्हारी अदा, तुम्हारी सूरत पर नीरव सदा।  तेरी सूरत व सीरत है ऐसे बनी, देखकर मैं तुझको हुआ हूँ फ़िदा।  एक मैं हूँ यहाँ , एक तू है यहाँ, खामोशियों का मंज़र भी यहाँ। मैं खोया हूँ तुझमें, ज़रा इस कदर, अब जाऊँ तो भी मैं जाऊं कहाँ।  मैं तुझे देखता ,  तू मुझे देखती। ये  ख़ामोशियाँ अब हमें देखती।  चुप क्यों हो बैठी, बोलो तो ज़रा, कुछ लब्ज़ मैं फेंकता,कुछ तुम फेंकती।  फिर  वो मुस्कुराके मेरी इसी बात पर, देखा था उसने आसमां के चांद पर।  हम  दोनो की ही नज़रे थी तब चांद पर, उसकी अम्बर में थी और मेरी उस पर।  मेरे चांद की नज़रे जब चांद से हटी, फिर खामोशियों की बादलियाँ घटी। कुछ उसने कहा, कुछ मैंने कहा।  यूँ ही बातों ही बातों में घड़ियाँ कटी।  यूँ ही बातों का चश्का फिर चढ़ने लगा, आस-पास का मौसम बिगड़ने लगा। हमारे  हालत  ज़रा  फिर  गंभीर से हुए, कि व्योम का चाँद भी बिछड़ने लगा।  वो प्यारा सा चाँद बिछड़ता चला,  फिर आगे की घटना पे पर्दा डला।  अरे कहने को अब भी बहुत कुछ है, लेकिन ना ही कहे तो है सबका भला।