सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Featured post

Suicide Poem | By Hariram Regar

 आत्महत्या  क्या विषाद था तेरे मन में? क्यों लटक गया तू फंदे पर? जो औरों को कन्धा देता, क्यों आज है वो पर कंधे पर? क्या गिला रहा इस जीवन से? जो अकाल काल के गले मिला। जिसको नभ में था विचरण करना, क्यों बंद कक्ष-छत तले मिला? क्या इतना विशाल संकट था? जो जीकर ना सुलझा पाया। अरे! इतनी भी क्या शर्म-अकड़? जो अपनो को ना बतलाया।  क्या जीवन से भारी कोई  जीवन में ही आँधी आई? इन छुट-मुट संकट के चक्कर में  मृत्यु ही क्यों मन भायी? हाँ हार गया हो भले मगर, हाँ कुछ ना मिला हो भले मगर, या जीत गया हो भले मगर, पर जीवन थोड़ी था हारा? अरे! हार जीत तो चलती रहती।  इस हार से ही क्यों अँधियारा ?

चलना मुझे अकेला | Chalna mujhe akela | Motivational Poem | By Hariram Regar

चलना मुझे  अकेला

सड़क पड़ी  सुनसान भाइयों !
चलना  मुझे   अकेला  था। 
इच्छा नहीं थी मेरी फिर भी,
मन  ने  मुझे  धकेला  था। 
सड़क पड़ी  सुनसान भाइयों !
चलना  मुझे   अकेला  था।1 

क्या बारिश से रुक सकता है?
चन्द्रमा     का    चलना। 
क्या बारिश से रुक सकता है?
पृथ्वी  का  घूर्णन  करना। 
यह मेरे मन ने मुझको बोला था। 
सड़क पड़ी  सुनसान भाइयों !
चलना  मुझे   अकेला  था।2

आज  बारिश  से  बच  सकता तू,
कल  दुःख  की  बाढ़  में   बहना। 
तू  इतनी सी बात  से  डरता  तो,
तुझे  स्वलक्ष्य  से  वंचित  रहना। 
मन  ने   मुझे   समझाते   हुए,
ऐसा   भी    कह    डाला   था। 
सड़क पड़ी  सुनसान भाइयों !
चलना  मुझे   अकेला  था।3

समय किसी से नहीं रुकता है,
यह  तो  निरन्तर  चलता है। 
जीत  भी  उसी   की  होती,
जो  समय पर सम्भलता  है। 
मुझको भी ऐसे  ही  चलना,
मस्तिष्क में यह  खयाला था। 
सड़क पड़ी  सुनसान भाइयों !
चलना  मुझे   अकेला  था।4

निकल पड़ा में लक्ष्य को  लेकर,
बस  चलने   को  ठान  लिया। 
सवार हुआ था साइकिल पर मैं,
छाता   सर  पर  तान  लिया। 
मस्त गति से साइकिल चलती,
पीछे    मेरा    थैला    था। 
सड़क पड़ी  सुनसान भाइयों !
चलना  मुझे   अकेला  था।5

---By Hariram Regar

Chalna Mujhe Akela Tha

sadak padee  sunasaan bhaiyon !

chalana  mujhe   akela  tha. 

ichchha nahin thee meree phir bhee,

man  ne  mujhe  dhakela  tha. 

sadak padee  sunasaan bhaiyon !

chalana  mujhe   akela  tha..1.. 


kya baarish se ruk sakata hai?

chandrama     ka    chalana. 

kya baarish se ruk sakata hai?

prthvee  ka  ghoornan  karana. 

yah mere man ne mujhako bola tha. 

sadak padee  sunasaan bhaiyon !

chalana  mujhe   akela  tha..2..


aaj  baarish  se  bach  sakata too,

kal  duhkh  kee  baadh  mein   bahana. 

too  itanee see baat  se  darata  to,

tujhe  svalakshy  se  vanchit  rahana. 

man  ne   mujhe   samajhaate   hue,

aisa   bhee    kah    daala   tha. 

sadak padee  sunasaan bhaiyon !

chalana  mujhe   akela  tha..3..


samay kisee se nahin rukata hai,

yah  to  nirantar  chalata hai. 

jeet  bhee  usee   kee  hotee,

jo  samay par sambhalata  hai. 

mujhako bhee aise  hee  chalana,

mastishk mein yah  khayaala tha. 

sadak padee  sunasaan bhaiyon !

chalana  mujhe   akela  tha..4..


nikal pada mein lakshy ko  lekar,

bas  chalane   ko  thaan  liya. 

savaar hua tha saikil par main,

chhaata   sar  par  taan  liya. 

mast gati se saikil chalatee,

peechhe    mera    thaila    tha. 

sadak padee  sunasaan bhaiyon !

chalana  mujhe   akela  tha..5..



टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

तेरा इन्तजार रहेगा | Tera Intzaar Rahega | By Hariram Regar

तेरा इन्तजार रहेगा मैं तुझसे हूँ मीलों दूर , तू  मु झसे है   कोसों दूर।  रहूँ मैं चाहे कैसा भी पर, प्यार करूँ तुझसे भरपूर।  ऐ सनम ! नहीं भूला तुझको , मुझको तुझसे प्यार रहेगा। बस तू मेरा इन्तजार कर , मुझको तेरा इन्तजार रहेगा॥ 1 ॥ हर पल हर क्षण याद करूँ मैं , भगवन से फरियाद करूँ मैं , जाने वो पल कब आएगा ? फिर भी वक्त बर्बाद करूँ मैं। तू मेरी रानी बन घर आये, ये दिल तेरा दिलदार रहेगा। बस तू मेरा इन्तजार कर , मुझको तेरा इन्तजार रहेगा॥ 2 ॥ तू मुझसे मौन थी पर , मैं न समझा तू नाराज़ है। तेरी इस ख़ामोशी में भी कोई न कोई राज़ है। तू ये ख़ामोशी भी बनाये रख, तेरी इस ख़ामोशी से भी प्यार रहेगा। बस तू मेरा इन्तजार कर , मुझको तेरा इन्तजार रहेगा॥ 3 ॥ ---By Hariram Regar Tera Intazaar Rahega main tujhse hoon meelon dur, Tu mujhase hai koson dur. rahoon main chaahe kaisa bhee par, pyaar karoon tujhase bharapoor| E sanam! nahin bhoola tujhako, mujhako tujhase

उदास धरती माँ

उदास धरती माँ तेरे चेहरे पे झलकती थी खूब ख़ुशी , तू पहनती थी हरी साड़ी ख़ुशी ख़ुशी । आती थी तेरे तन से फूलों की बास । हे धरती माँ ! आज क्यों है तू इतनी उदास ? आम अमरुद बरगद बबूल सब कहा गए ? तेरे सारे अंग आज शिथिल कैसे पड़ गए ? यहां पर आज किसने किया है वास ? हे धरती माँ ! आज क्यों है तू इतनी उदास ? तेरे ऊंचे ऊंचे पर्वतों के सर आज कैसे झुक गए ? चलती हुई नदियों के कदम आज कैसे रुक गए ? आज इन सरोवरों को क्यों लगी है प्यास ? हे धरती माँ ! आज क्यों है तू इतनी उदास ? पहले हवा में महकती थी सुमनों की सुगंध । इसमें आज फैली है प्लास्टिक थैलियों की दुर्गन्ध । कहाँ कर गए तेरे सारे सुमन प्रवास ? हे धरती माँ ! आज क्यों है तू इतनी उदास ? कैसे टूटा है यह   तेरा ओज़ोन कवच ? अब ये प्राणी कैसे पाएंगे बच ? जहाँ सूरज की गन्दी किरणों का फैला है त्रास।  हे धरती माँ ! आज क्यों है तू इतनी उदास ? तेरे ध्रुव खण्ड आज क्यों पिघल रहे ? समुद्री पानी के कदम भूमि पर क्यों चल रह